हमारी इंद्रियां मन की दासी हैं। वही करना चाहती हैं, जो मन चाहता है। मन "इंद्र" जैसा है। वह विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए ‘मेनका’ को भेजता है। कभी आपने जानने की कोशिश की है कि इंद्र देवता को विश्वामित्र जैसे ऋषि की तपस्या भंग करने की क्या जरूरत थी? यह काम तो राक्षसों का था। इन्द्र तो देवताओं के राजा थे। उनको यह सब करने की क्या जरूरत थी ! इंद्र के ऐसे और भी कई
किस्से हैं, जो उनके देवताओं का राजा होने की गरिमा से मेल नहीं खाते।
ये किस्से गलत नहीं हैं। इनके पीछे गूढ़ रहस्य छिपे हैं। यह मन ही है, जो हमारा ‘ध्यान’ किसी एक बिंदु पर ज्यादा देर टिकने नहीं देता। वह नई-नई इच्छाओं को जन्म देता है। हमारी अत्यधिक इच्छाएं ही हमारी उन्नति में बाधक हैं। हमारी बुनियादी जरूरतों में और अंतहीन इच्छाओं में फर्क है। इच्छाओं की पूर्ति न होना ही हमारे दु:खों का कारण है। इच्छा पैदा भी मन करता है और इच्छा पूर्ति न होने पर मन ही दु:ख के भाव को जन्म भी देता है। यह गौर करने वाली बात है कि जिसकी जितनी ज्यादा इच्छाएं
होंगी, वह जीवन में उतना ही असंतुष्ट और दु:खी नजर आएगा।
यह सब कहने का अर्थ ये बिल्कुल भी नहीं है कि हमारे भीतर कोई इच्छा पैदा ही नहीं होनी चाहिए या इच्छाओं का होना कोई बुरी बात है। लेकिन हां, हमें ज्यादा इच्छाएं पैदा करने से खुद को रोकना जरूरी है। बहुत ज्यादा इच्छा पैदा करने से हमारी ‘इच्छाशक्ति’ क्षीण होती है। जबकि "प्रबल इच्छाशक्ति" ही एक ऐसी शक्ति है, जिससे पूरी तरह असंभव जैसा प्रतीत होने वाला ‘कुछ भी’ होना संभव हो जाता है। प्रबल इच्छाशक्ति से ही मनोबल पैदा होता है। प्रबल इच्छाशक्ति और उच्छ श्रेणी के मनोबल से किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति संभव है। वह लक्ष्य चाहे भैतिक जगत से जुड़ा हो या अंतर्मन की यात्रा के किसी पड़ाव या फिर परम लक्ष्य से। मन के यहां-वहां जाने कहां-कहां भटकने और हमेशा चलायमान रहने से हमारी जो ऊर्जा व्यर्थ जाती है, उसे एकत्र करके जो ‘बल’ (फोर्स) जागृत होता है, वही मनोबल है।
विशेष परिस्थितियों में मनुष्य का मनोबल किसी तीव्र इच्छा से स्वत: ही जागृत हो जाता है। किसी हादसे में राज्य स्तर के फुटबाल खिलाड़ी का एक पैर घुटने से कट जाता है । एक ही झटके में जिन्दगी बदल जाती है। पहले बिस्तर, फिर व्हील चेयर और बाद में बैसाखी के सहारे खुद को यहां-वहां खींचना अब उसकी मजबूरी है। उसके मन में बार-बार, लगातार बस एक ही विचार आता है, एक ही इच्छा जागृत होती है कि किसी तरह वह अपने कटे हुए पैर की कमी को दूर कर ले। उसकी तमाम दूसरी इच्छाओं का उस वक्त स्वत: ही दमन हो जाता है। मन के सभी विचार घूमकर उसके पैर पर केंद्रित होने लगते हैं। इच्छाशक्ति जागृत होती है। प्रयास शुरू होते हैं। फिर कृत्रिम पैर के सहारे वह खड़ा होता है। निरंतर अभ्यास से उसका मनोबल बढ़ने लगता है। इच्छा सीमित है। किसी तरह कृत्रिम पैर के सहारे ही फुटबाल खेलना है। बस यही लक्ष्य है। इच्छाशक्ति प्रबल होती जाती है। फिर एक दिन वह उसी पैर से फिर फुटबाल खेलता है।
ऐसे अनगिनत उदाहरण है। इस युवक का अन्य इच्छाओं से ध्यान हटता है, जब उसका पैर कटता है। उसके मन का पैर पर केंद्रित होना विशेष परिस्थिति में संभव हुआ। सामान्य परिस्थितियों में मन को किसी एक जगह केंद्रित करना ही जटिल है। लेकिन यदि मन पर नियंत्रण करने की ठान ही लें तो यह उतना मुश्किल भी नहीं, जितना ज्यादातर लोगों को बगैर प्रयास किये लगता है। इसके लिए बस सही मायने में जिज्ञासु होना पर्याप्त है। जिज्ञासा हमें हर उस जानकारी तक पहुंचा देती है, जिसके न होने पर हमें ‘अज्ञान’ का आभास होता है।
सच तो यह है कि अज्ञान नामक कोई चीज होती ही नहीं है। जिस प्रकार हमें ‘अंधकार’ और ‘प्रकाश’ दो अलग-अलग चीज लगती हैं, लेकिन वास्तव में अंधकार का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता है। प्रकाश की अनुपस्थिति ही हमें अंधकार होने का आभास कराती है। अंधकार तो होता ही नहीं। बस जहां रोशनी नहीं पहुंच पहुंचती, वहां हमें अंधेरा लगता है। इसी प्रकार ‘अज्ञान’ कुछ नहीं होता। ‘ज्ञान’ यानि किसी विषय-वस्तु को जानकारी न होने से ही हमें ‘अज्ञान’ का आभास होता है। सही जानकारी मिलते ही ‘अज्ञान’ उसी प्रकार गायब हो जाता है जैसे बल्व जलते ही अंधेरा भाग जाता है।
‘मन’ से संबंधित बातों को विस्तार से रखने का अभिप्राय भी यही है। अंतर्मन की यात्रा के लिए मन पर नियंत्रण जरूरी है। यह तभी संभव है, जब हमें मन का ज्ञान हो। यानी मन से जुड़ी सभी जानकारियां हासिल हों।
हमारा अंत:करण चार भागों में है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। ये चारों बेहद सूक्ष्म हैं। यह आपस में इस तरह जुड़े होते हैं कि बगैर ‘ज्ञान’ के इनमें भेद कर पाना मुश्किल है। सामान्यत: मन हमारी बुद्धि पर भी राज करता है। बुद्धि के जरिए वह हमारी इंद्रियों को निर्देश देकर ‘कर्म’ करवाता रहता है। हम ऐसा कोई ‘कर्म’ नहीं करते, जिसका जाने-अनजाने में बुद्धि ने इंद्रियों को निर्देश न दिया हो। यहां ‘जाने-अनजाने’ शब्द का प्रयोग इसलिए किया गया है कि बहुत सारे कर्म हम बुद्धि का सही इस्तेमाल किये बगैर ही कर बैठते हैं। बस मन किया तो कर डाला।
वैसे तो बुद्धि इतनी शक्तिशाली है कि वह सब जानती हैं कि क्या सही है क्या गलत। क्या करना चाहिए, क्या नहीं। बुद्धि पल भर में ही किसी विचार का विश्लेषण करके उसके दूरगामी परिणामों की सटीक जानकारी देने में सक्षम होती है। लेकिन हमारा मन उसे ठीक से काम नहीं करने देता। मन एक पल में इतने अधिक विचार उत्पन्न करके बुद्धि को देता रहता है कि बुद्धि बेचारी चक्कर में पड़ जाती है कि वह किस विचार को कर्म में बदलने के लिए इंद्रियों को निर्देश दे कि - लो इसे करो। ऐसे में अक्सर बुद्धि बगैर विश्लेषण के ही इंद्रियों से कर्म करवाती रहती है। जाहिर है कि हर कर्म अपने फल को प्राप्त होता है। मन को पता होता है कि कुछ बातों को बुद्धि नहीं मानेगी तो मन उन विचारों को पैदा ही नहीं करता। जैसे यूं तो कुंए में कूदने में किसी का भी मन नहीं करेगा, लेकिन अगर मन अत्यधिक दु:खी हो जाए तो वह बुद्धि पर पूरी तरह से नियंत्रण कर उसकी विश्लेषण क्षमता को खत्म कर सकता है। ऐसे में बुद्धि मन की गुलाम बनकर व्यक्ति को कुंए में कूदने को भी विवश कर देती है।
मन का सबसे बड़ा मित्र अहंकार होता है। एक तरफ अत्यधिक मात्रा में अनावश्यक विचार उत्पन्न कर-करके मन बुद्धि को थकाता रहता है, दूसरी तरफ अहंकार भी बुद्धि को इस हद तक दबाकर रखता है कि बुद्धि अपना अस्तित्व ही भूल जाती है। उसको बस ‘मैं’ ही ‘मैं’ नजर आने लगता है। मन, बुद्धि और अहंकार से जुड़े चित्त का कार्य एकदम अलग है। हम जो कर्म करते हैं, हमारा चित्त बस सूक्ष्म रूप में उसका संग्रह कर लेता है। चित्त का कार्य हर कर्म को ‘मेमोरी’ के तौर पर दर्ज करना है। सब कुछ नाम, दृश्य या अनुभूति के रूप में सूक्ष्म तौर पर रिकॉर्ड होता रहता है। हमारे मन, बुद्धि या अहंकार को जब जरूरत होती है, चित्त पल भर में उस ‘मेमोरी’ का ऐसा चित्रण पेश कर देता है, जैसे हम कोई फिल्म देख रहे हों। निद्रा के दौरान जब हमारी इंद्रियां निष्क्रिय होती हैं तो यही चित्तवृत्तियां स्वप्न बनकर सजीव सी प्रतीत होती है। हम जिस कार्य को निरंतर और बार करने लगते हैं, वह हमारे चित्त में गहरे तक बैठ जाता है। उसका "इम्प्रेशन" बहुत ज्यादा तीक्ष्ण हो जाता है। जैसे किसी पत्थर पर गहरी चोट कर कुछ उकेर दिया हो। ऐसे ‘इम्प्रेशन’ को चित्त बार-बार मन को भेजता है या यूं कहें कि मन बार-बार चित्त से उसे लेता रहता है और बुद्धि के जरिये उसे बार-बार कर्म में परिवर्तित करवाता रहता है। ऐसे ही कर्मो को हम ‘आदत’ बोलते हैं।
तो इस प्रकार मन-बुद्धि-चित्त और अहंकार एक चक्र, एक साईकिल की तरह है, जो एक दूसरे से जुड़कर कर्म को गति प्रदान करते रहते है। इस गति को देखने, इसे पहचानने के लिए हमें अपने मन की गति को नियंत्रित करना आना चाहिए। एक बार इस बे-लगाम घोड़े में लगाम कस जाए तो हम बुद्धि के जरिए उस पर सवारी कर सकते हैं। सभी जीव-जन्तुओं में मनुष्य श्रेष्ठ है, क्योंकि उस जैसी तीक्षण बुद्धि किसी जीव को प्राप्त नहीं है। ज्ञान के अभाव में यही बुद्धि मन की गुलाम होती है और ज्ञान के जरिए इसी बुद्धि से पहले मन को गुलाम बनाया जा सकता है और फिर अंतर्मन के गूढ़ रहस्यों को भी जाना जा सकता है। यदि आपके मन में इससे जुडी कोई जिज्ञासा या कोई विचार आता है तो उसे आप ब्लॉग के ज़रिये ज़रूर शेयर करें।
किस्से हैं, जो उनके देवताओं का राजा होने की गरिमा से मेल नहीं खाते।
ये किस्से गलत नहीं हैं। इनके पीछे गूढ़ रहस्य छिपे हैं। यह मन ही है, जो हमारा ‘ध्यान’ किसी एक बिंदु पर ज्यादा देर टिकने नहीं देता। वह नई-नई इच्छाओं को जन्म देता है। हमारी अत्यधिक इच्छाएं ही हमारी उन्नति में बाधक हैं। हमारी बुनियादी जरूरतों में और अंतहीन इच्छाओं में फर्क है। इच्छाओं की पूर्ति न होना ही हमारे दु:खों का कारण है। इच्छा पैदा भी मन करता है और इच्छा पूर्ति न होने पर मन ही दु:ख के भाव को जन्म भी देता है। यह गौर करने वाली बात है कि जिसकी जितनी ज्यादा इच्छाएं
होंगी, वह जीवन में उतना ही असंतुष्ट और दु:खी नजर आएगा।
यह सब कहने का अर्थ ये बिल्कुल भी नहीं है कि हमारे भीतर कोई इच्छा पैदा ही नहीं होनी चाहिए या इच्छाओं का होना कोई बुरी बात है। लेकिन हां, हमें ज्यादा इच्छाएं पैदा करने से खुद को रोकना जरूरी है। बहुत ज्यादा इच्छा पैदा करने से हमारी ‘इच्छाशक्ति’ क्षीण होती है। जबकि "प्रबल इच्छाशक्ति" ही एक ऐसी शक्ति है, जिससे पूरी तरह असंभव जैसा प्रतीत होने वाला ‘कुछ भी’ होना संभव हो जाता है। प्रबल इच्छाशक्ति से ही मनोबल पैदा होता है। प्रबल इच्छाशक्ति और उच्छ श्रेणी के मनोबल से किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति संभव है। वह लक्ष्य चाहे भैतिक जगत से जुड़ा हो या अंतर्मन की यात्रा के किसी पड़ाव या फिर परम लक्ष्य से। मन के यहां-वहां जाने कहां-कहां भटकने और हमेशा चलायमान रहने से हमारी जो ऊर्जा व्यर्थ जाती है, उसे एकत्र करके जो ‘बल’ (फोर्स) जागृत होता है, वही मनोबल है।
विशेष परिस्थितियों में मनुष्य का मनोबल किसी तीव्र इच्छा से स्वत: ही जागृत हो जाता है। किसी हादसे में राज्य स्तर के फुटबाल खिलाड़ी का एक पैर घुटने से कट जाता है । एक ही झटके में जिन्दगी बदल जाती है। पहले बिस्तर, फिर व्हील चेयर और बाद में बैसाखी के सहारे खुद को यहां-वहां खींचना अब उसकी मजबूरी है। उसके मन में बार-बार, लगातार बस एक ही विचार आता है, एक ही इच्छा जागृत होती है कि किसी तरह वह अपने कटे हुए पैर की कमी को दूर कर ले। उसकी तमाम दूसरी इच्छाओं का उस वक्त स्वत: ही दमन हो जाता है। मन के सभी विचार घूमकर उसके पैर पर केंद्रित होने लगते हैं। इच्छाशक्ति जागृत होती है। प्रयास शुरू होते हैं। फिर कृत्रिम पैर के सहारे वह खड़ा होता है। निरंतर अभ्यास से उसका मनोबल बढ़ने लगता है। इच्छा सीमित है। किसी तरह कृत्रिम पैर के सहारे ही फुटबाल खेलना है। बस यही लक्ष्य है। इच्छाशक्ति प्रबल होती जाती है। फिर एक दिन वह उसी पैर से फिर फुटबाल खेलता है।
ऐसे अनगिनत उदाहरण है। इस युवक का अन्य इच्छाओं से ध्यान हटता है, जब उसका पैर कटता है। उसके मन का पैर पर केंद्रित होना विशेष परिस्थिति में संभव हुआ। सामान्य परिस्थितियों में मन को किसी एक जगह केंद्रित करना ही जटिल है। लेकिन यदि मन पर नियंत्रण करने की ठान ही लें तो यह उतना मुश्किल भी नहीं, जितना ज्यादातर लोगों को बगैर प्रयास किये लगता है। इसके लिए बस सही मायने में जिज्ञासु होना पर्याप्त है। जिज्ञासा हमें हर उस जानकारी तक पहुंचा देती है, जिसके न होने पर हमें ‘अज्ञान’ का आभास होता है।
सच तो यह है कि अज्ञान नामक कोई चीज होती ही नहीं है। जिस प्रकार हमें ‘अंधकार’ और ‘प्रकाश’ दो अलग-अलग चीज लगती हैं, लेकिन वास्तव में अंधकार का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता है। प्रकाश की अनुपस्थिति ही हमें अंधकार होने का आभास कराती है। अंधकार तो होता ही नहीं। बस जहां रोशनी नहीं पहुंच पहुंचती, वहां हमें अंधेरा लगता है। इसी प्रकार ‘अज्ञान’ कुछ नहीं होता। ‘ज्ञान’ यानि किसी विषय-वस्तु को जानकारी न होने से ही हमें ‘अज्ञान’ का आभास होता है। सही जानकारी मिलते ही ‘अज्ञान’ उसी प्रकार गायब हो जाता है जैसे बल्व जलते ही अंधेरा भाग जाता है।
‘मन’ से संबंधित बातों को विस्तार से रखने का अभिप्राय भी यही है। अंतर्मन की यात्रा के लिए मन पर नियंत्रण जरूरी है। यह तभी संभव है, जब हमें मन का ज्ञान हो। यानी मन से जुड़ी सभी जानकारियां हासिल हों।
हमारा अंत:करण चार भागों में है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। ये चारों बेहद सूक्ष्म हैं। यह आपस में इस तरह जुड़े होते हैं कि बगैर ‘ज्ञान’ के इनमें भेद कर पाना मुश्किल है। सामान्यत: मन हमारी बुद्धि पर भी राज करता है। बुद्धि के जरिए वह हमारी इंद्रियों को निर्देश देकर ‘कर्म’ करवाता रहता है। हम ऐसा कोई ‘कर्म’ नहीं करते, जिसका जाने-अनजाने में बुद्धि ने इंद्रियों को निर्देश न दिया हो। यहां ‘जाने-अनजाने’ शब्द का प्रयोग इसलिए किया गया है कि बहुत सारे कर्म हम बुद्धि का सही इस्तेमाल किये बगैर ही कर बैठते हैं। बस मन किया तो कर डाला।
वैसे तो बुद्धि इतनी शक्तिशाली है कि वह सब जानती हैं कि क्या सही है क्या गलत। क्या करना चाहिए, क्या नहीं। बुद्धि पल भर में ही किसी विचार का विश्लेषण करके उसके दूरगामी परिणामों की सटीक जानकारी देने में सक्षम होती है। लेकिन हमारा मन उसे ठीक से काम नहीं करने देता। मन एक पल में इतने अधिक विचार उत्पन्न करके बुद्धि को देता रहता है कि बुद्धि बेचारी चक्कर में पड़ जाती है कि वह किस विचार को कर्म में बदलने के लिए इंद्रियों को निर्देश दे कि - लो इसे करो। ऐसे में अक्सर बुद्धि बगैर विश्लेषण के ही इंद्रियों से कर्म करवाती रहती है। जाहिर है कि हर कर्म अपने फल को प्राप्त होता है। मन को पता होता है कि कुछ बातों को बुद्धि नहीं मानेगी तो मन उन विचारों को पैदा ही नहीं करता। जैसे यूं तो कुंए में कूदने में किसी का भी मन नहीं करेगा, लेकिन अगर मन अत्यधिक दु:खी हो जाए तो वह बुद्धि पर पूरी तरह से नियंत्रण कर उसकी विश्लेषण क्षमता को खत्म कर सकता है। ऐसे में बुद्धि मन की गुलाम बनकर व्यक्ति को कुंए में कूदने को भी विवश कर देती है।
मन का सबसे बड़ा मित्र अहंकार होता है। एक तरफ अत्यधिक मात्रा में अनावश्यक विचार उत्पन्न कर-करके मन बुद्धि को थकाता रहता है, दूसरी तरफ अहंकार भी बुद्धि को इस हद तक दबाकर रखता है कि बुद्धि अपना अस्तित्व ही भूल जाती है। उसको बस ‘मैं’ ही ‘मैं’ नजर आने लगता है। मन, बुद्धि और अहंकार से जुड़े चित्त का कार्य एकदम अलग है। हम जो कर्म करते हैं, हमारा चित्त बस सूक्ष्म रूप में उसका संग्रह कर लेता है। चित्त का कार्य हर कर्म को ‘मेमोरी’ के तौर पर दर्ज करना है। सब कुछ नाम, दृश्य या अनुभूति के रूप में सूक्ष्म तौर पर रिकॉर्ड होता रहता है। हमारे मन, बुद्धि या अहंकार को जब जरूरत होती है, चित्त पल भर में उस ‘मेमोरी’ का ऐसा चित्रण पेश कर देता है, जैसे हम कोई फिल्म देख रहे हों। निद्रा के दौरान जब हमारी इंद्रियां निष्क्रिय होती हैं तो यही चित्तवृत्तियां स्वप्न बनकर सजीव सी प्रतीत होती है। हम जिस कार्य को निरंतर और बार करने लगते हैं, वह हमारे चित्त में गहरे तक बैठ जाता है। उसका "इम्प्रेशन" बहुत ज्यादा तीक्ष्ण हो जाता है। जैसे किसी पत्थर पर गहरी चोट कर कुछ उकेर दिया हो। ऐसे ‘इम्प्रेशन’ को चित्त बार-बार मन को भेजता है या यूं कहें कि मन बार-बार चित्त से उसे लेता रहता है और बुद्धि के जरिये उसे बार-बार कर्म में परिवर्तित करवाता रहता है। ऐसे ही कर्मो को हम ‘आदत’ बोलते हैं।
तो इस प्रकार मन-बुद्धि-चित्त और अहंकार एक चक्र, एक साईकिल की तरह है, जो एक दूसरे से जुड़कर कर्म को गति प्रदान करते रहते है। इस गति को देखने, इसे पहचानने के लिए हमें अपने मन की गति को नियंत्रित करना आना चाहिए। एक बार इस बे-लगाम घोड़े में लगाम कस जाए तो हम बुद्धि के जरिए उस पर सवारी कर सकते हैं। सभी जीव-जन्तुओं में मनुष्य श्रेष्ठ है, क्योंकि उस जैसी तीक्षण बुद्धि किसी जीव को प्राप्त नहीं है। ज्ञान के अभाव में यही बुद्धि मन की गुलाम होती है और ज्ञान के जरिए इसी बुद्धि से पहले मन को गुलाम बनाया जा सकता है और फिर अंतर्मन के गूढ़ रहस्यों को भी जाना जा सकता है। यदि आपके मन में इससे जुडी कोई जिज्ञासा या कोई विचार आता है तो उसे आप ब्लॉग के ज़रिये ज़रूर शेयर करें।

No comments:
Post a Comment