Thursday, June 6, 2013

मन के जीते जीत है, मन के हारे हार। Post 1



 Inner Journey यानी अंतर्यात्रा को बयान करती है यह तस्वीर ! तस्वीर के केंद्र में दो आँखें हैं . एक खुली हुई और दूसरी बंद आँख ....उसके चारो ओर घूमती हुई पूरी बाहरी दुनियां है ...प्रकृति  - पेड़ पौधे ,पशु -पक्षी ,धरती, आकाश,समुद्र, जलजीव और पहाड़। दरअसल यह तस्वीर हमें दो तरह अनुभवों के होने का अहसास कराती है . खुली आँख से हम बाहरी जगत का अनुभव करते हैं लेकिन आँख बंद होते ही हम अपने भीतर की यात्रा करते हैं ...अपने भीतर की यात्रा को ही हम आंतरिक यात्रा ( Inner Journey ) कहते हैं।जिस प्रकार हम बाहरी दुनियां को देखते हैं और उसको अनुभव करते हैं, वैसे ही हम अपने भीतर बसी पूरी सृष्टि का भी अनुभव कर सकते हैं।

ब्लोगिंग ...! यह भी  अन्तर्मन के आयामों की बाहरी प्रस्तुति का
एक और माध्यम ही है। वैसे जहाँ तक आंतरिक यात्रा ( Inner Journey ) के अनुभवों को व्यक्त करने की बात है तो उसको पूरी तरह अभिव्यक्त किया ही नहीं जा सकता ...जिस प्रकार हम बोलते हैं की "हवा का झोंका " आया तो हम उसको अनुभव ही कर पातें हैं, पर जिसने कभी हवा के झोंके का अनुभव न किया हो उसको किसी भी प्रकार की भाषा या शब्दों से व्यक्त करके हम उसे  "हवा के झोंके" की अनुभूति नहीं करा सकते उसी प्रकार अंतर्मन की यात्रा को सिर्फ अनुभव ही किया जा सकता है। यहाँ इस बात को थोड़ा और स्पष्ट करने के लिए   शास्त्र (मुण्डक उपनिषद -१/१/४ ) का सन्दर्भ ले सकते हैं- जिसमें  बताया गया है की इस  संसार में दो प्रकार की विधाएँ जानने योग्य हैं . "परा" और "अपरा विधा"...परा में सभी विज्ञान, कला ,साहित्य (वेद इत्यादि ) आदि वो सभी विधा आती हैं जिनको सुनकर,पढ़कर,बोलकर जाना जा सकता है . लेकिन अपरा विधा के बारे में कहा गया है कि वह अव्यक्त है ...उसको व्यक्त ही नहीं जा सकता ....उसको सिर्फ अनुभव जा सकता है।  

अब ऐसे में सहज सा सवाल उठता है कि जिसको किसी भी प्रकार व्यक्त ही नहीं किया जा सकता, आखिर उस विधा को कोई समझेगा कैसे ? जानेगा कैसे ? और ऐसी किसी विधा को जानने से क्या लाभ है ? इन  सवालों के जवाब की चर्चा हम आगे करेंगे ....फिलहाल तो अपरा विधा की महिमा के बारे में इतना कहना है कि इस विधा के जानकार को संसार की किसी भी विधा को अलग से जानने की कोई ज़रूरत ही नहीं रह जाती ....इस विधा के जानकार को ही आध्यात्म में ज्ञानी कहा जाता है। ज्ञानी गुरु से बढ़कर संसार में कोई नहीं है। ऐसे ही ज्ञानी गुरु के लिए कबीर दास ने कहा है," गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागूं पांव ,बलिहारी गुरु आपकी गोविन्द दियो बताय।" ऐसे ही ज्ञानी गुरु रामकृष्ण परम हंस जी की एक द्रष्टि भर से स्वामी विवेकानंद को पलभर में ही "ईश्वर " के दर्शन हो गए थे और स्वामी  विवेकानंद  को आत्मज्ञान प्राप्त हो गया था।

आत्मज्ञान का अर्थ ही है स्वयं की खोज ....और स्वयं की खोज करने के लिए आपको कहीं बाहर की यात्रा करने जरुरत नहीं होती ..उसके लिए तो आपको अपने भीतर ही जाना होता है ...अपने भीतर की यात्रा से ही हम अपने वास्तविक स्वरुप को जान पाते हैं। और इस काम को करने का मतलब यह बिलकुल भी नहीं की इसके लिए आपको अपना घर परिवार छोड़ के जंगल में तपस्या करने जाना होगा। उसके लिए आपको अन्तर्मन की यात्रा करनी होगी। एक ऐसी यात्रा जिसमे आप उस ईश्वर के वास्तविक स्वरुप को जानने का प्रयास करते हैं जो आपके अपने ही मन मंदिर में छुपा बैठा है और इस पूरी स्रष्टि को चला रहा है।   
जिस प्रकार बाहरी दुनिया में किसी गंतव्य स्थान पर जाने से पहले हम उसके बारे में कुछ जानकारी हासिल कर लेते हैं तो यात्रा थोड़ी आसान हो जाती है, वैसे ही अंतर्मन की यात्रा करने से पहले भी उसकी थोड़ी जानकारी हासिल करना जरूरी है। अंतर्मन यानी मन के अंदर की यात्रा..। हालांकि हम बचपन से ही सुनते आए हैं और अपने से छोटों को समझाते भी आए हैं कि मन लगाकर पढ़ो या मन लगाकर काम करो, लेकिन क्या कभी आपने यह जानने की कोशिश की है कि ये मन लगता  कैसे है ? मजेदार बात यह है कि मन की इस यात्रा की शुरुआत में ही सबसे बड़े पहाड़ के रूप में हमारा अपना मन ही अवरोध बनकर खड़ा होता है, जबकि हमको तो इसी मन के भीतर जाना है लेकिन मन है कि मानता नहीं। 

मन तो ऐसी चीज है कि उस पर काबू करना ज्यादातर लोगों को असंभव सा कार्य लगता है। मन ऐसी चीज है कि पल भर को भी स्थिर नहीं रहता। अभी यहां तो अभी वहां और वहां से जाने कहां। ये कभी ठहरने का नाम ही नहीं लेता। सच तो यह है कि हम मन के गुलाम बनकर जीवन गुजार देते हैं और बोलते भी हैं कि मन ये कर रहा है, मन वो कर रहा है। मन मुताबिक काम हो जाए तो हम खुश और मन के विपरीत हो जाए तो हम दुखी। दरअसल यह मन हमें बंदर की तरह नचाता रहता है। हमको लगता है कि भीतर कहीं हमारा अपना वजूद है लेकिन फिर भी हम मन को अपना स्वामी बनाकर उसके दास के रूप में हमेशा खटते रहते हैं। हम दिन रात इस मन के इशारे पर नाचते रहते हैं लेकिन यह मन हमें एक पल भी चैन से नहीं रहने देता।

 इसकी उड़ान तो अतरिक्ष यानों से तेज और गहराई समुद्र से भी गहरी है, इसका एक छोर हमारी इंद्रियों से जुड़ा होता है तो दूसरा छोर किसी कंप्यूटर की हार्ड डिस्कनुमा हमारे चित्त से जुड़ा रहता है। हम अपनी आंख से जो देखते हैं, कान से जो सुनते हैं , मुंह से जो बोलते हैं और नाक से जो गंध लेते हैं तथा शरीर से जो स्पर्श अनुभव करते हैं वो हमारे अवचेतन से गुजरकर चित्त में मेमोरी बनकर जमा होता रहता है। अगर हम जरा सा ध्यान दें तो हम अपने मन को या तो अपने चित्त की मेमोरीज के आसपास घूमते हुए पाते हैं या अपनी इंद्रियों के जरिये मन तक पहुंचने वाले किसी ताजा दृश्य,नाम ,श्रवण, गंध या स्पर्श के इर्द गिर्द ही घूमता हुआ पाएंगे। यदि किसी दृश्य, श्रवण,गंध, नाम या स्पर्श को हमारी इंद्रियों ने कभी ग्रहण ना किया हो हमारा मन भी उसकी ओर नहीं जाता । उदाहरण के लिए अगर हम नाम लेते हैं गुलाब का तो आपके मन में तुरंत गुलाब की तसवीर आ जाती है और जरूरत पड़ने पर गुलाब से संबंधित वो सभी जानकारियां आप सोच पाते हैं जो पहले से ही आपके जेहन में दर्ज होती हैं। लेकिन अगर आपके सामने नाम लिया जाए त्वासे तो आप कुछ भी नहीं सोच पाते क्योंकि जापान के इस फूल के बारे में आपकी मेमोरी में पहले से कुछ भी फीड नहीं है इसलिए आपका मन त्वासे की ओर कभी जाएगा भी नहीं।

 कुल मिलाकर हमारा मन सिर्फ दो चीजों के इर्द गिर्द घूमता है। एक नाम, दूसरा दृश्य । हम वस्तु, पदार्थ, व्यक्ति आदि सभी चीजों को या तो दृश्य के तौर पर अपनी मेमोरी में रखते हैं या फिर नाम के तौर पर। इस तरह कोई भी नाम लेने पर दृश्य और दृश्य सामने होने पर उसका नाम स्वत: ही हमारे मन में आ जाता है। अब इतना स्पष्ट हो जाने पर हम यह जान सकते हैं   कि अंतर्मन की यात्रा में सबसे पहले पहाड़ के रूप में आने वाली बाधा यानी अपना  ही मन कितनी जटिल चीज है ।लेकिन जो मन हमको गुलाम बनाकर इधर उधर भटकाता रहता है ,उसी मन को अगर हम अपना गुलाम बना ले तो दुनिया कोई ऐसी शक्ति नहीं ,जिसे हम अपने भीतर जाग्रत नहीं कर सकते।एक बार अगर मन हमारी गुलामी स्वीकार कर ले ,तो फिर उसको अपना मित्र बनाकर भी रखा जा सकता है।लेकिन मन की गुलामी छोड़ कर उसको अपना गुलाम बनाना ज़रूरी है। इसे किये बगेर अंतर्मन की यात्रा शुरू नहीं की जा सकती। पर इस कार्य को किया कैसे जाये ? क्या मन को गुलाम बनाना एक दिन में संभव है? अगली पोस्ट में हम इस पर चर्चा करेंगे। यदि आपके मन में इससे जुडी कोई जिज्ञासा या कोई विचार आता है तो उसे आप ब्लॉग के ज़रिये ज़रूर शेयर करें।अगली पोस्ट तक इस पुराणी कहावत को याद रखें - मन के जीते जीत है, मन के हारे हार।

2 comments:

  1. man to bawra hai, bahar bhatkata hai to khud ke andar ki yatra me kahan chorega. Duniya jeetne ki tamanna ho to ise gulam banane ki disha me juta jaye, par antarman ki yatra ko bandhano se mukt kyo na rakha jaye... sochi samjhi disha me jana ho tabhi man ko apne anusar chalayen. par jab ek antheen nirwat me atmik urja ke sahare yatra karni ho anand tabhi ayega jab man ko mukt bahne diya jaye....ho sakta hai niyantrit yatra ka anand hi alag ho,,yahi to seekhna samajhna hai...

    vinod Raturi

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  2. जब हम सांसारिक या्त्रा पर निकलते हैं तब भी मन का साथ होना और मन को जीतना जरुरी है, मन के जीते ही जीत मिलेगी न, लेकिन बात यहां सांसरिक यात्रा की नहीं आध्‍यात्मिक यात्रा की हो रही है जो अर्न्‍तमन से हो कर जाती है उस परमधाम तक जहां परम सत्‍य का दर्शन होता है,जब आपने यात्रा शुरु कर दी है तो इतना तो समझ आ रहा है कि आपने सत्‍य के बारे में कुछ न कुछ जान लिया है, बस इस यात्रा को जारी रखिये, आपको मानसिक स्‍तर पर व्‍यक्तिगत उपलब्धि के रूप में जो भी परिणाम हासिल हों वह आपको तो अपने स्‍व के निकट ले जायेगा ही लेकिन आपकी इस यात्रा का असर आपकी सांसारिक कार्यशैली पर अवश्‍य दिखाई देगा जो राष्‍ट्रीय सहारा तथा इस पत्र से जुडे तमाम लोगों के लिए जरुर अच्‍छा संकेत है,आपके इस लेख को पढने के बाद आपसे उम्‍मीदें काफी बढ गई हैं,मुझे इस बात की बहुत खुशी हो रही है कि मेरे अखबार के संपादक के भीतर स्‍व को जानने की पिपासा उत्‍पन्‍न हो रही है और वह इस रास्‍ते पर चलते दिखाई दे रहे हैं, इसकी शुरुआत करने के लिए भी कई जन्‍मों की यात्रा करनी पडती है, ईश्‍वर की अनुकंपा आप पर दिखाई दे रही है, अब आप चाहें या न चाहें आपकी इस यात्रा का असर आपके कर्म क्षेत्र पर भी दिखाई देगा जिसका लाभ सीधे सीधे अखबार व अखबार से जुडे लोगों को मिलेगा, ईश्‍वर आपको इस रास्‍ते पर आगे बढने की शक्ति बनाये रखे

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