Monday, April 20, 2015

मन में छिपी है असीमित शक्ति ! Post-2

हमारी इंद्रियां मन की दासी हैं। वही करना चाहती हैं, जो मन चाहता है। मन "इंद्र" जैसा है। वह विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए ‘मेनका’ को भेजता है। कभी आपने जानने की कोशिश की है कि इंद्र देवता को विश्वामित्र जैसे ऋषि की तपस्या भंग करने की क्या जरूरत थी? यह काम तो राक्षसों का था। इन्द्र तो देवताओं के राजा थे। उनको यह सब करने की क्या जरूरत थी ! इंद्र के ऐसे और भी कई
किस्से हैं, जो उनके देवताओं का राजा होने की गरिमा से मेल नहीं खाते।

ये किस्से गलत नहीं हैं। इनके पीछे गूढ़ रहस्य छिपे हैं। यह मन ही है, जो हमारा ‘ध्यान’ किसी एक बिंदु पर ज्यादा देर टिकने नहीं देता। वह नई-नई इच्छाओं को जन्म देता है। हमारी अत्यधिक इच्छाएं ही हमारी उन्नति में बाधक हैं। हमारी बुनियादी जरूरतों में और अंतहीन इच्छाओं में फर्क है। इच्छाओं की पूर्ति न होना ही हमारे दु:खों का कारण है। इच्छा पैदा भी मन करता है और इच्छा पूर्ति न होने पर  मन ही दु:ख के भाव को जन्म भी देता है। यह गौर करने वाली बात है कि जिसकी जितनी ज्यादा इच्छाएं